विलियम पियानु: मैदान से लेकर आईसीयू तक, एक फुटबॉलर की अविस्मरणीय जीवन-गाथा

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जीवन, एक अप्रत्याशित खेल की तरह है, जहां हर मोड़ पर नई चुनौतियां और नए प्रतिद्वंद्वी मिलते हैं। कभी जीत मिलती है, तो कभी हार का सामना करना पड़ता है, लेकिन असली नायक वह है जो हर हाल में लड़ता रहे। आज हम एक ऐसे ही अदम्य भावना वाले व्यक्ति की कहानी आपके सामने लाए हैं – इतालवी फुटबॉल के पूर्व खिलाड़ी विलियम पियानु की। एक समय था जब वह इटली के बड़े मैदानों में अपना कौशल दिखाते थे, बड़े-बड़े खिलाड़ियों के साथ खेलते थे, लेकिन फिर जीवन ने उन्हें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा किया, जहां उन्हें फुटबॉल के मैदान से कहीं बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी।

मैदान का गौरव: जुवेंटस से लेकर सीरी बी तक

विलियम पियानु, जिनका जन्म 1975 में हुआ, ने अपने फुटबॉल करियर की शुरुआत जुवेंटस के युवा अकादमी में की। सोचिए, एक युवा खिलाड़ी जो डेल पिएरो जैसे दिग्गजों के साथ पाला पड़ा हो, जिसने रॉबर्टो बैगियो जैसे महान खिलाड़ी को मैदान पर `मारक` करने का प्रयास किया हो, उसके लिए यह कितना गौरवशाली पल रहा होगा। 1993 में जुवेंटस की युवा टीम के साथ उन्होंने स्काउडेटो और वायारेगियो टूर्नामेंट दोनों जीते। जुवेंटस के लिए सीनियर टीम में जगह बनाना आसान नहीं था, इसलिए उन्होंने प्रो वर्सेली, रिमिनी और सिटैडेला जैसे क्लबों में लोन पर खेलकर अनुभव प्राप्त किया। बाद में, उन्होंने बारी और ट्रेविसो जैसे क्लबों के लिए सीरी बी और सी में लगभग 300 मैच खेले। ट्रेविसो में अपने सात सीज़नों के दौरान, उन्होंने युवा टोनी के साथ खेला और नस्लवाद के खिलाफ अपने साथी ओमोलेड के समर्थन में अपनी टीम के साथ चेहरे पर काला रंग लगाकर मैदान पर उतरकर एकता का संदेश दिया।

पर्दे के पीछे का संघर्ष: फुटबॉलर से आम आदमी तक

फुटबॉल करियर के बाद, विलियम पियानु ने भी कई अन्य खिलाड़ियों की तरह एक नई राह तलाशने की कोशिश की। उन्होंने कोचिंग में हाथ आजमाया, लेकिन पेशेवर स्तर पर कोई मौका नहीं मिला। यह खेल की दुनिया की एक कड़वी सच्चाई है कि चमक-दमक के बाद कई खिलाड़ी गुमनामी में चले जाते हैं और एक सामान्य जीवन जीने के लिए संघर्ष करते हैं। पियानु ने भी खुद को संभाला और सम्मान के साथ जीवन यापन करने के लिए कई तरह के काम किए। वह एक कॉफी शॉप में बारिस्टा बने, कपड़ों की दुकान में सेल्समैन का काम किया और यहाँ तक कि गोदाम में भी काम किया। यह सुनकर शायद कुछ लोगों को हैरानी हो, लेकिन यह एक पूर्व पेशेवर खिलाड़ी के जीवन की विनम्र सच्चाई को दर्शाता है – खेल के मैदान की चकाचौंध के बाद, एक साधारण जीवन की चुनौतियां कितनी बड़ी हो सकती हैं।

कैल्सियोस्कॉमेसे का कलंक: न्याय की लंबी लड़ाई

मान लीजिए कि आप अपने जीवन के एक बड़े हिस्से में ईमानदार रहे हों, लेकिन फिर आप पर ऐसा दाग लग जाए जिसका आप से कोई लेना-देना न हो। विलियम पियानु के साथ भी ऐसा ही हुआ। 2011 में जब इटली में `कैल्सियोस्कॉमेसे` (मैच-फिक्सिंग) घोटाला सामने आया, तो उनका नाम भी 150 संदिग्धों में शामिल था। उन्हें पहले तो धोखाधड़ी के लिए दोषी ठहराया गया और सात महीने की जेल व तीन साल के प्रतिबंध की सजा सुनाई गई। आठ साल तक उन्हें न्याय के लिए लड़ना पड़ा, और आखिरकार 2015 में, बारी की अपीलीय अदालत ने उन्हें `दोषमुक्त` घोषित किया। यह साबित हो गया कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया था। हालाँकि, इस घटना ने उनके करियर पर एक ऐसा गहरा निशान छोड़ दिया, जिसे मिटाना आसान नहीं था। यह उस पीड़ा को दर्शाता है जब एक निर्दोष व्यक्ति को समाज और व्यवस्था के सामने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए वर्षों संघर्ष करना पड़ता है।

जीवन का सबसे बड़ा मैच: कैंसर के खिलाफ जंग

लेकिन पियानु की सबसे कठिन लड़ाई अभी आनी बाकी थी। अप्रैल में, उन्हें लिम्फैटिक सिस्टम कैंसर का पता चला। यह एक ऐसी खबर थी जिसने उनके जीवन को हिला कर रख दिया। उन्होंने कहा, “मैंने सोचा था कि मैं मर जाऊंगा।” वह 46 दिनों तक इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में रहे, दवा के प्रभाव से कोमा में थे। उन्हें उस दौरान के धुंधले यादें हैं, लेकिन एक बात साफ है: उन्होंने अपनी पत्नी वेरोनिका का हाथ कसकर पकड़ा और उससे अपनी बेटी का ख्याल रखने का वादा लिया, यह सोचते हुए कि ये उनके आखिरी शब्द हो सकते हैं। इस दौरान उन्होंने लगभग 30 किलोग्राम वजन कम कर लिया।

“मैंने अपनी पत्नी वेरोनिका का हाथ कसकर पकड़ा। मैंने उससे हमारी बच्ची का ख्याल रखने को कहा। वे मेरे आखिरी शब्द हो सकते थे।” – विलियम पियानु

इस भयानक दौर से बाहर निकलने के लिए उन्हें परिवार के प्यार और समर्थन की सबसे ज्यादा जरूरत थी। कीमोथेरेपी के कई साइकल हुए, लेकिन विलियम पियानु ने हार नहीं मानी। उन्होंने फुटबॉल के मैदान की तरह ही इस बीमारी से भी लड़ा, हर पल, हर सांस के लिए। उनकी हिम्मत रंग लाई। अब उनकी बीमारी कम हो रही है और वह धीरे-धीरे ठीक हो रहे हैं। यह एक सच्ची प्रेरणा है कि कैसे मानवीय भावना सबसे भयानक परिस्थितियों में भी अडिग रह सकती है।

नया लक्ष्य, नई आशा: हर पल को जीना

आज, विलियम पियानु चिकित्सा करा रहे हैं, लेकिन बीमारी पर उनकी पकड़ मजबूत हो रही है। हालांकि उन्हें अभी भी खड़े होने में कठिनाई होती है, फिर भी वह टीवी पर फुटबॉल मैच देखते हैं, खेल के बारीक विवरणों और खिलाड़ियों की हरकतों पर ध्यान देते हैं। उनके अंदर अभी भी एक कोच छिपा है, और वह दोबारा कोचिंग में लौटने का सपना देखते हैं।

जीवन में इतने उतार-चढ़ाव देखने के बाद, उनके मन में कोई पछतावा नहीं है। उनकी एकमात्र इच्छा अब अपने परिवार के साथ हर पल का आनंद लेना है। उन्होंने कहा, “50 साल की उम्र में, मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ हर पल का आनंद लेना चाहता हूं। मैं अब लंबे समय तक की योजना नहीं बना सकता। जीवन वापस नहीं आता।” यह एक शक्तिशाली संदेश है कि जीवन की हर चुनौती के बाद, सबसे महत्वपूर्ण चीज़ प्यार, परिवार और वर्तमान पल का मूल्य समझना है। विलियम पियानु की कहानी हमें यह सिखाती है कि चाहे मैदान हो या अस्पताल, जीवन के हर खेल में जीत उसी की होती है जो कभी हार नहीं मानता।

रोहित कपूर

रोहित कपूर बैंगलोर से हैं और पंद्रह साल के अनुभव के साथ खेल पत्रकारिता के दिग्गज हैं। टेनिस और बैडमिंटन में विशेषज्ञ हैं। उन्होंने खेल पर एक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल बनाया है, जहां वे महत्वपूर्ण मैचों और टूर्नामेंटों का विश्लेषण करते हैं। उनके विश्लेषणात्मक समीक्षाओं की प्रशंसा प्रशंसकों और पेशेवर खिलाड़ियों द्वारा की जाती है।