टेनिस की चमक फीकी? शंघाई मास्टर्स का अधूरा फाइनल और बेकर का सवाल

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टेनिस की दुनिया में `मास्टर्स` टूर्नामेंट एक विशेष स्थान रखते हैं। ये वो मंच होते हैं जहाँ खेल के दिग्गज अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन करते हैं, रोमांचक मुकाबले पेश करते हैं और खिताब के लिए जमकर लोहा लेते हैं। लेकिन हाल ही में शंघाई मास्टर्स के फाइनल ने खेल प्रेमियों और विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है: क्या टेनिस के इन प्रतिष्ठित आयोजनों से `स्टार पावर` धीरे-धीरे गायब हो रही है?

महान टेनिस खिलाड़ी और छह बार के ग्रैंड स्लैम विजेता बोरिस बेकर ने इस बहस को एक नई धार दी है। शंघाई में, जहाँ आमतौर पर नोवाक जोकोविच, डेनियल मेदवेदेव जैसे बड़े नाम खिताब के लिए भिड़ते दिखते हैं, इस बार फाइनल मोनेगास्क के वैलेंटिन वाशेरो और फ्रांस के आर्थर रिंडरकनेश के बीच खेला गया। बेकर ने सीधे तौर पर कहा कि एटीपी (एसोसिएशन ऑफ टेनिस प्रोफेशनल्स) शीर्ष खिलाड़ियों की अनुपस्थिति से खुश नहीं हो सकती। और भला क्यों हो? आखिर दर्शक टिकट खरीदते हैं और प्रायोजक पैसा लगाते हैं, तो उन्हें खेल के सबसे बड़े सितारों को कोर्ट पर देखना होता है।

कल्पना कीजिए, एक फिल्म का प्रीमियर है और उसमें उसके मुख्य नायक ही नदारद हों! कुछ ऐसा ही अहसास शंघाई के फाइनल ने दिया। बेशक, हर खिलाड़ी अपनी जगह महत्वपूर्ण होता है, लेकिन `मास्टर्स` टूर्नामेंट की पहचान ही शीर्ष-10 खिलाड़ियों की भागीदारी और उनके अंतिम चरणों तक पहुँचने से होती है। बेकर के शब्दों में, “संभव है कि मेदवेदेव और जोकोविच सेमीफाइनल में होते, तो स्थिति कुछ संभल जाती, लेकिन रिंडरकनेश बनाम वाशेरो का फाइनल…” यह एक ऐसा बयान है जो एटीपी की मीडिया टीम के लिए एक चुनौती बन जाता है, क्योंकि उन्हें इस कहानी को “साल के सबसे बड़े टेनिस इवेंट” के रूप में पेश करना होता है। यह एक कड़वी सच्चाई है – मास्टर्स टूर्नामेंट का मतलब सिर्फ भाग लेना नहीं, बल्कि अपने प्रदर्शन से चमकना भी है।

आजकल के व्यस्त टेनिस कैलेंडर में खिलाड़ियों की चोटें और थकान आम बात है। शीर्ष खिलाड़ियों को अपने शरीर का ध्यान रखना होता है और वे हर टूर्नामेंट में अपनी पूरी ऊर्जा के साथ नहीं खेल सकते। यह उनकी प्राथमिकता है, और यह समझा जा सकता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इससे `मास्टर्स` जैसे आयोजनों की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आती? जब एक दर्शक यह देखता है कि जिस सितारे को देखने वह आया है, वह शुरुआती दौर में ही बाहर हो गया या आया ही नहीं, तो उसकी निराशा स्वाभाविक है। प्रायोजकों के लिए भी यह एक चिंता का विषय है, क्योंकि उनकी ब्रांडिंग बड़े नामों से जुड़ी होती है।

एटीपी के लिए यह एक मुश्किल संतुलन का खेल है। एक तरफ खिलाड़ियों का स्वास्थ्य और दूसरी तरफ टूर्नामेंट की भव्यता और आर्थिक व्यवहार्यता। `मास्टर्स` शब्द अपने आप में एक अपेक्षा लेकर आता है – मास्टर्स का मतलब है मास्टर्स का खेल। यदि कोर्ट पर “मास्टर्स” नहीं होंगे, तो क्या यह सिर्फ एक और साधारण टूर्नामेंट बनकर रह जाएगा? यह विडंबना ही है कि जिस टूर्नामेंट का नाम `मास्टर्स` है, वह अपने `मास्टर्स` खिलाड़ियों की अंतिम उपस्थिति के लिए तरस रहा है।

भविष्य में, एटीपी को इस चुनौती से निपटने के लिए नई रणनीतियों पर विचार करना होगा। क्या खिलाड़ियों के लिए कुछ प्रोत्साहन योजनाएं लानी होंगी, या टूर्नामेंट कैलेंडर को और सुव्यवस्थित करना होगा? यह सिर्फ शंघाई की बात नहीं है, बल्कि यह पूरे टेनिस जगत के लिए एक विचारणीय प्रश्न है कि कैसे `मास्टर्स` टूर्नामेंटों की चमक को बरकरार रखा जाए और उन्हें वास्तव में खेल के दिग्गजों का मंच बनाए रखा जाए, ताकि हर फाइनल एक यादगार कहानी बन सके, न कि केवल एक आंकड़ा। आखिर, टेनिस का जादू उसके सितारों में ही छिपा है।

धीरज मेहता

धीरज मेहता नई दिल्ली के एक खेल पत्रकार हैं जिन्हें बारह साल का अनुभव है। कबड्डी की स्थानीय प्रतियोगिताओं की कवरेज से शुरुआत करने वाले धीरज अब क्रिकेट, फुटबॉल और फील्ड हॉकी पर लिखते हैं। उनके लेख रणनीतिक विश्लेषण में गहराई से जाने के लिए जाने जाते हैं। वे एक साप्ताहिक खेल कॉलम लिखते हैं और लोकप्रिय खेल पोर्टल्स के साथ सक्रिय रूप से काम करते हैं।