सेबिनो नेला: मैदान के योद्धा से जीवन के महारथी तक – एक बेमिसाल सफर

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सेबिनो नेला की तस्वीर

इटली के फुटबॉल जगत में कुछ नाम ऐसे हैं, जो सिर्फ मैदान पर अपने प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि जीवन के मैदान में भी अपनी अद्भुत दृढ़ता के लिए जाने जाते हैं। सेबिनो नेला उन्हीं में से एक हैं। गेनोआ और रोमा जैसे क्लबों के लिए खेलने वाले इस पूर्व फुटबॉलर की कहानी सिर्फ फुटबॉल की नहीं, बल्कि संघर्ष, बीमारी से जूझने और एक अटूट मानवीय भावना की दास्तान है। हाल ही में उन्होंने अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं को एक साक्षात्कार में साझा किया, जिसने न सिर्फ उनके प्रशंसकों को बल्कि आम लोगों को भी गहराई से छू लिया है।

फुटबॉल का सफर: मिट्टी से महिमा तक

सेबिनो नेला की पहचान सिर्फ `सेबिनो` खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि `सेबास्टियानो` नामक उस व्यक्ति के रूप में भी है, जो फुटबॉल की जर्सी के नीचे छिपा था। रोमा के प्रशंसक उन्हें `पिकिया सेबिनो` (सेबिनो को मारो) कहकर पुकारते थे, जिसका मतलब था मैदान पर उनकी अदम्य जिद्द, न कि हिंसक प्रवृत्ति। जैसा कि उन्होंने खुद स्पष्ट किया है, वह मैदान पर कभी किसी को मारते नहीं थे, बल्कि एक `जिद्दी` खिलाड़ी थे।

उनका फुटबॉल का सफर भी किसी परी कथा से कम नहीं। एक साधारण पृष्ठभूमि से आए नेला ने बताया कि कैसे उन्हें एक `सिफारिश` के माध्यम से फुटबॉल की दुनिया में प्रवेश मिला। यह बात आज के समय में शायद विडंबनापूर्ण लगे, जब हर युवा खिलाड़ी अपने दम पर आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन नेला के लिए यह एक अवसर था। उन्होंने अपने जीवन का पहला घास का मैदान तब देखा, जब उन्होंने सीरी बी में पदार्पण किया, इससे पहले वे सिर्फ मिट्टी के मैदानों पर ही खेले थे।

उनके माता-पिता का त्याग और उनका कठिन परिश्रम इस कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। दिन में 18 घंटे रेस्तरां में काम करने वाले पिता और जो माँ अपने बेटे के फुटबॉल के जूते खरीदने के लिए अपनी खुद की जुराबें तक नहीं खरीदती थीं – ये विवरण हमें सेबिनो के मजबूत नैतिक मूल्यों की जड़ें दिखाते हैं। उनके जीवन का सबसे यादगार पल तब था, जब गेनोआ के लिए पदार्पण के बाद वह अपनी कमाई घर लाए और उनके पिता की आँखों में आँसू आ गए। जब उन्हें रोमा के साथ अपना पहला बड़ा अनुबंध (40 मिलियन लीरा) मिला, तो वह अपने माता-पिता को काम से छुट्टी दिला सके। यह किसी भी बेटे के लिए गर्व का क्षण होता है।

रोमा का जुनून और दिल टूटने के पल

रोमा के साथ उनका रिश्ता सिर्फ एक खिलाड़ी और क्लब का नहीं था, बल्कि एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव था। उन्होंने तुरंत समझ लिया था कि रोमा क्या है, और प्रतिद्वंद्वी प्रशंसकों की गालियां उन्हें और अधिक ऊर्जावान बना देती थीं। 1983 में स्कुडेटो (इतालवी लीग खिताब) जीतना उनके करियर का शिखर था, लेकिन हार के क्षण भी थे जो कम दर्दनाक नहीं थे। लिवरपूल के खिलाफ चैंपियंस लीग फाइनल में हार (1984) उन्हें अभी भी सालती है। उनका मानना ​​था कि वह उस पेनल्टी को खुद ले सकते थे, बजाय ग्राज़ियानी को पास देने के। हालांकि, उन्होंने कहा कि उस हार को उन्होंने अच्छी तरह से पचा लिया था।

इससे भी बुरा था दो साल बाद लेसे से हारकर स्कुडेटो गंवाना। इस पर वह कहते हैं, “मिलान में अधिक विचलित करने वाली चीजें हैं, लेकिन रोम एक आदर्श शहर है।” रोमा के प्रशंसकों की उन्होंने यूरोप की सर्वश्रेष्ठ फैनबेस में से एक के रूप में प्रशंसा की। फाल्काओ जैसे महान खिलाड़ी के बारे में उनका कहना था कि वह एक अद्भुत व्यक्ति थे, लेकिन चैंपियंस लीग फाइनल में पेनल्टी न लेने पर उन्हें निराशा हुई थी। हाँ, अब फाल्काओ को भी शायद उस निर्णय पर पछतावा होता होगा।

संगीत की धुन और जीवन का फलसफा

फुटबॉल के अलावा, संगीत भी सेबिनो के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रसिद्ध इतालवी गायक एंटोनेलो वेंडिट्टी ने उन्हें “कोरेन्डो कोरेन्डो” (Correndo correndo) नामक एक गीत समर्पित किया था। नेला यह गीत दिन में कम से कम एक बार सुनते हैं। हालांकि, उन्हें आज के संगीत समारोहों से निराशा है। वह कहते हैं कि उन्होंने 10 साल से सान्रेमो फेस्टिवल नहीं देखा है, क्योंकि यह एक “बड़ा राजनीतिक शो” बन गया है, जहाँ कलाकार अपने विचार व्यक्त करने के लिए मंच का उपयोग करते हैं। एक दिलचस्प अवलोकन करते हुए उन्होंने कहा कि “आज के युवा पैटी प्रावो और बैटिस्टी के गाने गाते हैं, लेकिन वर्तमान कलाकारों को कोई याद नहीं रखेगा।” यह आधुनिक संस्कृति पर एक हल्की-फुल्की लेकिन तीखी टिप्पणी है।

कैंसर से जंग: एक व्यक्तिगत महाभारत

सेबिनो नेला की कहानी का सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक हिस्सा है कैंसर से उनकी लड़ाई। उन्हें कोलन कैंसर था, एक ऐसी बीमारी जिससे उन्होंने अपने कई करीबी साथियों को खोया। उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी कहानी साझा की, जिसमें उन्होंने खुद को “भाग्यशाली” बताया। उन्होंने कहा, “हम फुटबॉलर लक्ष्य बनाकर जीते हैं, एक मैच के बाद दूसरा। मैंने बीमारी के साथ भी ऐसा ही किया।” कीमोथेरेपी के बाद पेट दर्द से जूझते हुए, रात में पाँच घंटे बाथरूम में बिताने के दिनों को याद करते हुए, उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया। उन्होंने खुद से कहा, `चलो बाथरूम में चार घंटे रहने की कोशिश करते हैं। फिर साढ़े तीन घंटे, फिर तीन घंटे।` और यह काम कर गया।

उनकी इस बात में गहरी सच्चाई और थोड़ी विडंबना भी है कि लोग उनके ठीक होने को उनके “शारीरिक बनावट” से जोड़ते हैं। उन्होंने उन सभी साथियों को याद किया जो इस बीमारी से हार गए: विन्सेन्ज़ो डी`अमिको, पाओलो रॉसी, सिनिसा मिहाजलोविच, जियानलुका वियाली। “मुझमें और उनमें एकमात्र अंतर यह है कि मैं अधिक भाग्यशाली था।” यह स्वीकारोक्ति उनकी विनम्रता और दूसरों के प्रति गहरी सहानुभूति दर्शाती है।

उनके परिवार ने भी इस दौरान काफी कुछ झेला। एक रात जब उन्होंने अपनी पत्नी और बेटियों को रोते हुए देखा, तो उन्होंने उनसे कहा, “बस करो, अब तुम्हें मेरी मदद करनी है।” इस घटना ने घर के माहौल को बदल दिया। उनके पिता और चाचा इसी बीमारी से चल बसे थे। उनकी बहन, जिसे वह दुनिया में सबसे ज्यादा सम्मान देते थे, आठ साल के इलाज के बाद बीमारी से हार गई। उनकी दूसरी बहन 14 सालों से कैंसर के साथ जी रही है। उनका परिवार कैंसर से तबाह हो गया था, जिसके वे हकदार नहीं थे। उस समय उन्हें अपना पीला पड़ा चेहरा दिखाना पसंद नहीं था, अब वह हमेशा `टैन` रहने की कोशिश करते हैं। यह छोटे-से विवरण उनके जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

सेबिनो नेला कहते हैं, “मुझमें और [कैंसर से मरने वाले] उन सभी साथियों में एकमात्र अंतर यह है कि मैं अधिक भाग्यशाली था।”

वर्तमान और भविष्य की ओर

अपने वर्तमान जीवन के बारे में बात करते हुए, नेला ने अपनी विविध रुचियों का भी जिक्र किया। उन्हें न्यूजीलैंड में माओरी जनजाति के लोगों से बात करना अच्छा लगेगा, लेकिन लाज़ियो के समुद्र तट पर टहलना भी उन्हें उतना ही सुकून देता है। वह राजनीति और भू-राजनीति पढ़ना पसंद करते हैं, और शतरंज खेलते हैं। फुटबॉल के भविष्य पर भी उनकी नजर है: नापोली के पास फिर से जीतने की क्षमता है, इंटर सबसे अच्छा खेलती है, और मिलान `डार्क हॉर्स` हो सकती है। रोमा के लिए, शीर्ष चार में आना एक “असाधारण परिणाम” होगा। गैस्परिनी जैसे कोच को समय की आवश्यकता होती है।

सेबिनो नेला की कहानी सिर्फ एक खेल आइकन की नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने जीवन के हर मोड़ पर असाधारण साहस और दृढ़ता का परिचय दिया है। उनका सफर हमें सिखाता है कि हार और जीत सिर्फ खेल का हिस्सा नहीं होते, बल्कि जीवन की असली लड़ाई बाहरी विरोधियों से नहीं, बल्कि आंतरिक दृढ़ता से जीती जाती है।

रोहित कपूर

रोहित कपूर बैंगलोर से हैं और पंद्रह साल के अनुभव के साथ खेल पत्रकारिता के दिग्गज हैं। टेनिस और बैडमिंटन में विशेषज्ञ हैं। उन्होंने खेल पर एक लोकप्रिय यूट्यूब चैनल बनाया है, जहां वे महत्वपूर्ण मैचों और टूर्नामेंटों का विश्लेषण करते हैं। उनके विश्लेषणात्मक समीक्षाओं की प्रशंसा प्रशंसकों और पेशेवर खिलाड़ियों द्वारा की जाती है।